ॐ
दैनिक दिव्य श्लोक संग्रह
भगवद् गीता, उपनिषद् और वेदों से 21 दिव्य श्लोक — हिंदी अर्थ सहित
श्लोक 1
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में नहीं। फल की आसक्ति से रहित होकर कर्म करो।
— भगवद् गीता 2.47
श्लोक 2
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
हे धनंजय! आसक्ति त्यागकर, सफलता-असफलता में समभाव रखते हुए कर्म करो — यही योग है।
— भगवद् गीता 2.48
श्लोक 3
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
स्वयं अपना उद्धार करो, खुद को नीचे मत गिरने दो। मनुष्य स्वयं अपना मित्र भी है और अपना शत्रु भी।
— भगवद् गीता 6.5
श्लोक 4
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
श्रद्धावान, तत्पर और जितेन्द्रिय मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है और शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त होता है।
— भगवद् गीता 4.39
श्लोक 5
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा।
— भगवद् गीता 18.66
श्लोक 6
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णानि
अन्यानि संयाति नवानि देही॥
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है, वैसे ही आत्मा नया शरीर धारण करती है।
— भगवद् गीता 2.22
श्लोक 7
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, अग्नि नहीं जला सकती, जल नहीं गला सकता, वायु नहीं सुखा सकती।
— भगवद् गीता 2.23
श्लोक 8
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अवतार लेता हूं।
— भगवद् गीता 4.7
श्लोक 9
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
जो भक्त अनन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं, उनका योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूं।
— भगवद् गीता 9.22
श्लोक 10
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्॥
मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है। विषयासक्त मन बांधता है, विषयरहित मन मुक्त करता है।
— अमृतबिन्दु उपनिषद्
श्लोक 11
सत्यमेव जयते नानृतम्
सत्येन पन्था विततो देवयानः।
सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य से ही देवलोक का मार्ग प्रशस्त है।
— मुण्डक उपनिषद् 3.1.6
श्लोक 12
अहिंसा परमो धर्मः
धर्म हिंसा तथैव च।
अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। किसी भी जीव को कष्ट न देना ही सबसे बड़ा धर्म है।
— महाभारत — आदिपर्व
श्लोक 13
विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति धनाद् धर्मं ततः सुखम्॥
विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है।
— हितोपदेश
श्लोक 14
आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।
आत्मा को देखना, सुनना, मनन करना और ध्यान करना चाहिए।
— बृहदारण्यक उपनिषद् 2.4.5
श्लोक 15
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्॥
सभी सुखी हों, सभी रोग-रहित हों, सभी का कल्याण हो, कोई दुःखी न हो।
— शान्ति मन्त्र
श्लोक 16
ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
गुरु-शिष्य की एक साथ रक्षा हो, एक साथ शक्ति अर्जित हो। विद्या तेजस्वी हो।
— तैत्तिरीय उपनिषद् 2.2.2
श्लोक 17
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मामृतं गमय।
अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाओ।
— बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28
श्लोक 18
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद् धनम्॥
जगत में सब कुछ ईश्वर से व्याप्त है। त्याग-भाव से उपभोग करो।
— ईशोपनिषद् 1
श्लोक 19
असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मामृतं गमय।
असत्य से सत्य, अंधकार से प्रकाश, मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।
— बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28
श्लोक 20
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
वह पूर्ण है, यह पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण निकालने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।
— ईशोपनिषद् — शान्ति पाठ
श्लोक 21
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर हैं। गुरु साक्षात् परब्रह्म हैं — नमस्कार है।
— गुरु स्तोत्र