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सनातन धर्म का इतिहास

सनातन का अर्थ है — शाश्वत। जिसका न आरम्भ है, न अंत। यह किसी एक व्यक्ति ने नहीं बनाया, किसी एक दिन शुरू नहीं हुआ। यह सहस्रों वर्षों में सहस्रों ऋषियों की अनुभूति से बहती हुई एक नदी है — जो आज भी बह रही है।

एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।
सत्य एक ही है, विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।
— ऋग्वेद 1.164.46

“सनातन” शब्द का अर्थ

संस्कृत में सनातन का अर्थ है — शाश्वत, नित्य, जो सदा से है और सदा रहेगा। सनातन धर्म अर्थात् वह धर्म जो काल से परे है। यहाँ “धर्म” का अर्थ केवल religion नहीं है — धर्म वह है जो धारण करता है, जो सृष्टि और समाज को टिकाए रखता है।

हिंदू शब्द का मूल भौगोलिक है। सिंधु नदी को प्राचीन फ़ारसी में हिन्दु कहा गया, और सिंधु के पार रहने वाले लोगों के लिए यह नाम प्रचलित हुआ। इस प्रकार सनातन धर्म परम्परा का अपना नाम है, जबकि हिंदू बाहर से दिया गया भौगोलिक परिचय है — दोनों आज एक ही परम्परा को दर्शाते हैं।

कालक्रम — युग-दर-युग यात्रा

पढ़ने से पूर्व

नीचे दी गई तिथियाँ आधुनिक ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक शोध पर आधारित अनुमान हैं, और विद्वानों में इन पर मतभेद है। पारम्परिक मान्यता वेदों को अनादि एवं अपौरुषेय मानती है। दोनों दृष्टियों को यहाँ आदरपूर्वक साथ रखा गया है।

लगभग 7000–3300 ईसा पूर्व
आदि काल एवं मेहरगढ़
बलूचिस्तान के मेहरगढ़ में कृषि, पशुपालन, मृद्भांड और दंत-चिकित्सा तक के प्रमाण मिले हैं। यह उपमहाद्वीप की स्थायी बस्तियों का आरम्भिक चरण है, जिससे आगे चलकर सिंधु-सरस्वती सभ्यता विकसित हुई।
लगभग 3300–1300 ईसा पूर्व
सिंधु-सरस्वती सभ्यता
हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा, राखीगढ़ी और कालीबंगा — नियोजित नगर, जल-निकासी व्यवस्था, स्नानागार, मानकीकृत बाट-माप और विशाल व्यापार। यहाँ से मिली पशुपति मुहर, स्वस्तिक चिह्न और योग-मुद्रा जैसी आकृतियाँ आगे की सनातन परम्परा से जोड़कर देखी जाती हैं, यद्यपि सिंधु लिपि अब तक पढ़ी नहीं जा सकी है।
लगभग 1500–1000 ईसा पूर्व
ऋग्वैदिक काल
ऋग्वेद की रचना — 10 मंडल, 1028 सूक्त, लगभग 10,600 मंत्र। अग्नि, इंद्र, वरुण, उषा और सरस्वती की स्तुतियाँ। नासदीय सूक्त (10.129) में सृष्टि की उत्पत्ति पर वह गहन प्रश्न पूछा गया जो आज भी दर्शन का शिखर माना जाता है — “तब न सत् था, न असत्”।
लगभग 1000–600 ईसा पूर्व
उत्तर वैदिक काल
यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद का संकलन। ब्राह्मण एवं आरण्यक ग्रंथों की रचना। यज्ञ-संस्कृति का विस्तार तथा चार आश्रम और चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की व्यवस्था का विकास।
लगभग 800–500 ईसा पूर्व
उपनिषद् काल — चिंतन की क्रांति
यज्ञ से आत्मज्ञान की ओर मोड़। बृहदारण्यक, छान्दोग्य, कठ, ईश, मुण्डक जैसे उपनिषदों में अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि जैसे महावाक्य। याज्ञवल्क्य, उद्दालक, गार्गी और मैत्रेयी जैसे ऋषि-ऋषिकाएँ। यही काल भारतीय दर्शन की नींव है।
लगभग 600–200 ईसा पूर्व
महाकाव्य एवं दर्शन का युग
वाल्मीकि रामायण एवं व्यास रचित महाभारत का वर्तमान स्वरूप। भगवद् गीता महाभारत के भीष्म पर्व का अंग। पाणिनि की अष्टाध्यायी — संसार का पहला वैज्ञानिक व्याकरण। षड्दर्शनों की व्यवस्थित रचना। पारम्परिक मान्यता महाभारत काल को इससे कहीं प्राचीन मानती है।
322–185 ईसा पूर्व
मौर्य साम्राज्य
चन्द्रगुप्त मौर्य और चाणक्य। कौटिल्य का अर्थशास्त्र — राजनीति, अर्थव्यवस्था और प्रशासन पर विश्व का एक अद्वितीय ग्रंथ। तक्षशिला विद्या का प्रमुख केंद्र।
लगभग 320–550 ईस्वी
गुप्त काल — स्वर्ण युग
कालिदास का काव्य, आर्यभट का आर्यभटीय (शून्य, दशमलव पद्धति एवं पृथ्वी के घूमने का विवेचन), वराहमिहिर का खगोल, सुश्रुत परम्परा की शल्य-चिकित्सा, अजंता की चित्रकला और नालंदा महाविहार की स्थापना। मंदिर स्थापत्य का उदय।
लगभग 8वीं शताब्दी
आदि शंकराचार्य एवं अद्वैत
केवल बत्तीस वर्ष के जीवन में पूरे भारत की पदयात्रा, प्रस्थानत्रयी पर भाष्य, और चार दिशाओं में चार मठों की स्थापना — जिसने बिखरती परम्परा को पुनः एक सूत्र में बाँधा।
7वीं–17वीं शताब्दी
भक्ति आंदोलन
दक्षिण के आलवार-नयनार संतों से आरम्भ होकर रामानुज, माध्व, बसवण्णा, कबीर, रविदास, मीरा, तुलसीदास, सूरदास, चैतन्य महाप्रभु, नामदेव, तुकाराम और शंकरदेव तक — लोकभाषा में गाया गया धर्म, जो हर घर तक पहुँचा।
19वीं–20वीं शताब्दी
आधुनिक पुनर्जागरण
राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द और श्री अरविन्द — सामाजिक सुधार के साथ वेदान्त का पुनरुत्थान और विश्व-मंच पर भारत की आध्यात्मिक पहचान की पुनर्स्थापना।

श्रुति परम्परा — बिना लिखे कैसे बचा ज्ञान

सनातन परम्परा की सबसे विलक्षण उपलब्धि यह है कि वेद सहस्रों वर्षों तक बिना लिखेसुरक्षित रहे। इन्हें श्रुति कहा गया — अर्थात् जो सुनी गई।

इस सुरक्षा के लिए ऋषियों ने अद्भुत पद्धतियाँ बनाईं। मंत्र को केवल क्रम से नहीं, बल्कि उलट-पुलट कर अनेक विधियों से कंठस्थ कराया जाता था — पद पाठ, क्रम पाठ, जटा पाठ और घन पाठ। यदि एक शब्द भी बदल जाए तो यह जाल तुरंत पकड़ लेता था। यह प्राचीन विश्व की सबसे प्रभावी error-correction व्यवस्था थी।

विश्व मान्यता

यूनेस्को ने वैदिक पाठ की इस मौखिक परम्परा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दी है — यह स्वीकार करते हुए कि इस पद्धति ने एक विशाल ग्रंथ-राशि को सहस्रों वर्षों तक लगभग अपरिवर्तित रखा।

आदि शंकराचार्य एवं चार मठ

आठवीं शताब्दी के आसपास केरल के कालडी में जन्मे आदि शंकराचार्य ने अल्पायु में ही उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और भगवद् गीता — इस प्रस्थानत्रयी पर भाष्य लिखे और अद्वैत वेदान्त की स्थापना की। उनका मूल सिद्धांत था — ब्रह्म ही सत्य है और आत्मा उससे भिन्न नहीं।

उन्होंने भारत की चार दिशाओं में चार मठ स्थापित किए, जिससे परम्परा को संगठित निरंतरता मिली:

मठदिशा एवं स्थानसम्बद्ध वेद
शृंगेरी शारदा पीठदक्षिण — कर्नाटकयजुर्वेद
गोवर्धन पीठपूर्व — पुरी, ओडिशाऋग्वेद
शारदा पीठपश्चिम — द्वारका, गुजरातसामवेद
ज्योतिर्मठउत्तर — बद्रिकाश्रम, उत्तराखंडअथर्ववेद

भक्ति आंदोलन — धर्म जन-जन तक

भक्ति आंदोलन सनातन इतिहास का सबसे बड़ा सामाजिक परिवर्तन था। इसका संदेश सरल था — ईश्वर तक पहुँचने के लिए न संस्कृत का ज्ञान चाहिए, न विस्तृत कर्मकांड, न कोई मध्यस्थ। केवल प्रेम चाहिए।

इस आंदोलन का सबसे बड़ा योगदान यह था कि इसने भारतीय भाषाओं को साहित्यिक ऊँचाई दी। अवधी, ब्रज, मराठी, बांग्ला, तमिल और कन्नड़ का समृद्ध भक्ति-साहित्य आज भी इन भाषाओं की आत्मा है।

आधुनिक पुनर्जागरण

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।
— कठोपनिषद् 1.3.14 (स्वामी विवेकानन्द का प्रिय मंत्र)

विश्व को भारत का योगदान

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सनातन धर्म कितना पुराना है?

सनातन धर्म को विश्व की सबसे प्राचीन जीवित धर्म-परम्परा माना जाता है। ऋग्वेद को आधुनिक शोध सामान्यतः लगभग 1500–1200 ईसा पूर्व का मानता है, जबकि पारम्परिक मान्यता इसे अनादि और अपौरुषेय — अर्थात् किसी मनुष्य द्वारा रचित नहीं — मानती है। "सनातन" शब्द का अर्थ ही है शाश्वत, जिसका न आदि है न अंत।

सनातन धर्म का संस्थापक कौन है?

सनातन धर्म का कोई एक संस्थापक नहीं है। यह किसी एक व्यक्ति या एक ग्रंथ पर आधारित नहीं, बल्कि सहस्रों ऋषियों की अनुभूतियों, वेदों, उपनिषदों, दर्शनों और लोक-परम्पराओं से क्रमशः विकसित हुई एक जीवन पद्धति है। यही इसे अन्य प्रमुख धर्मों से भिन्न बनाता है।

"हिंदू" और "सनातन" में क्या अंतर है?

सनातन धर्म परम्परा का अपना, भीतर से दिया गया नाम है जिसका अर्थ है शाश्वत धर्म। "हिंदू" शब्द भौगोलिक मूल का है — यह सिंधु नदी से बना, जिसे प्राचीन फ़ारसी में "हिन्दु" कहा गया, और आगे चलकर सिंधु पार रहने वाले लोगों के लिए प्रयुक्त हुआ। इस प्रकार सनातन धर्म का अर्थ धार्मिक है, हिंदू का मूल भौगोलिक।

चार वेद कब लिखे गए?

वेद हजारों वर्षों तक गुरु-शिष्य परम्परा में मौखिक रूप से — श्रुति के रूप में — संरक्षित रहे। स्वर, मात्रा और उच्चारण की अत्यंत कठोर पद्धतियों (पद पाठ, क्रम पाठ, घन पाठ) के कारण वे बिना परिवर्तन के सुरक्षित रहे। लेखन बहुत बाद में हुआ। यूनेस्को ने वैदिक पाठ की इस मौखिक परम्परा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया है।

भक्ति आंदोलन क्या था?

भक्ति आंदोलन लगभग सातवीं शताब्दी में दक्षिण भारत के आलवार और नयनार संतों से आरम्भ होकर सोलहवीं–सत्रहवीं शताब्दी तक पूरे भारत में फैला। इसने ईश्वर तक पहुँचने के लिए कर्मकांड या संस्कृत के ज्ञान को अनिवार्य नहीं माना — केवल प्रेम और भक्ति को पर्याप्त बताया। संत लोकभाषा में गाते थे, जिससे धर्म हर वर्ग तक पहुँचा।